पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी अब उत्तराखंड के काम आएगा। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों से होने वाले पलायन को रोकने और कृषि को मुनाफे का सौदा बनाने के लिए धामी सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। सरकार ने राज्य के 11 पहाड़ी जिलों के लिए 'स्वैच्छिक-आंशिक चकबंदी प्रोत्साहन नीति' को हरी झंडी दिखाते हुए इसकी आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। इस महायोजना के तहत अगले 5 वर्षों में 275 गांवों की सूरत बदलने का लक्ष्य रखा गया है। राजस्व सचिव डॉ. एस.एन. पांडेय की ओर से जारी इस नीति के बाद अब सभी जिलों में धरातल पर काम शुरू करने की तैयारी तेज हो गई है।
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि आधारित आजीविका के सामने सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक विषमता और बिखरी हुई भूमि (जोत) रही है। एक ही किसान के खेत अलग-अलग जगहों पर बिखरे होने के कारण वैज्ञानिक ढंग से खेती करना असंभव था। इसी मजबूरी के कारण लोगों को रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ रहा था और गांव खाली हो रहे थे। इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए धामी सरकार ने चकबंदी को एकमात्र विकल्प के रूप में चुना है, जिससे बिखरी जमीन को एक जगह संहत (इकट्ठा) किया जा सके। नीति के मुताबिक, प्रत्येक पहाड़ी जिले में स्वैच्छिक चकबंदी के लिए 10-10 गांवों को सूचीबद्ध किया जाएगा। पहले चरण में हर साल 11 जिलों के 5-5 गांवों में चकबंदी प्रक्रिया शुरू होगी। इस तरह 5 साल में कुल 275 गांवों का पूर्ण कायाकल्प किया जाएगा। सरकार ने साफ किया है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी। किसी भी गांव को चिह्नित करने के लिए न्यूनतम 10 हेक्टेयर क्षेत्रफल या कम से कम 25 भूमिधरों (खातेदारों) की लिखित सहमति होना अनिवार्य है। चकबंदी के दौरान जमीन, पेड़ या अन्य बुनियादी ढांचों के मूल्यांकन में आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करने के लिए राजस्व अधिकारियों की एक विशेष टीम गठित की जाएगी, जो मौके पर ही समस्याओं का त्वरित समाधान करेगी। इसके अलावा, राज्य से लेकर जिला स्तर तक मजबूत समीक्षा समितियां भी बनाई जाएंगी। जो गांव इस नीति के तहत आगे आएंगे, उन्हें सरकार सड़क, सिंचाई, बिजली और उन्नत बीज जैसी तमाम आधुनिक सुविधाएं प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराएगी।

