तिरंगे में लिपटे बेटे को देख मां-बाप का रो-रोकर बुरा हाल; पूरे क्षेत्र ने सांझा किया परिवार का दुख

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टिहरी। उत्तराखंड की वीरभूमि ने देश सेवा की वेदी पर अपना एक और युवा सपूत खो दिया है। जम्मू में तैनात टिहरी गढ़वाल के जांबाज अग्निवीर रोहित रावत का शुक्रवार को उनके पैतृक घाट बिनपुला में पूरे सैन्य और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। तिरंगे में लिपटे वीर जवान के पार्थिव शरीर को देखकर हर आंख नम हो गई। सेना के जवानों ने हवा में गोलियां दागकर और गार्ड ऑफ ऑनर देकर अपने साथी को अंतिम सलामी दी। इस दुखद और भावुक पल में अपने वीर सपूत को अंतिम विदाई देने के लिए मेंदू सिंधवाल गांव और आसपास के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में जनसैलाब उमड़ पड़ा।

टिहरी जिले के घनसाली क्षेत्र स्थित मेंदू सिंधवाल गांव के रहने वाले रोहित रावत (21 वर्ष) के सीने में देश सेवा का जज्बा कूट-कूट कर भरा था। वह एक वर्ष पूर्व ही सेना की 'अग्निवीर योजना' के तहत भारतीय सेना का हिस्सा बने थे। कठिन और कड़ा सैन्य प्रशिक्षण पूरा करने के बाद इसी वर्ष जनवरी 2026 में उनकी पहली तैनाती भारतीय सेना की प्रतिष्ठित 20 गढ़वाल राइफल्स में जम्मू क्षेत्र में हुई थी। अभी देश सेवा के उनके सपने को पंख लगे ही थे कि बीते बुधवार, 10 जून की सुबह ड्यूटी के दौरान एक बेहद दुखद घटना घट गई। जानकारी के अनुसार, जम्मू में अपनी पोस्ट पर मुस्तैदी से तैनात रोहित रावत को अचानक उनकी सर्विस राइफल से गोली लग गई। गोली लगते ही वह गंभीर रूप से घायल हो गए और जब तक उन्हें चिकित्सा सहायता मिलती, उन्होंने दम तोड़ दिया। गोली किन परिस्थितियों में और कैसे चली, इसका सटीक कारण अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है, सैन्य अधिकारियों के मुताबिक मामले की उच्च स्तरीय जांच शुरू कर दी गई है। जैसे ही सैन्य वाहन वीर जवान का पार्थिव शरीर लेकर गुरुवार देर शाम गांव पहुंचा, पूरे क्षेत्र में कोहराम मच गया। 'रोहित रावत अमर रहें' और 'भारत माता की जय' के नारों से पूरा पहाड़ी अंचल गूंज उठा। रोहित के असमय चले जाने से उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। रोहित के पिता सुरेंद्र सिंह आजीविका के लिए दुबई के एक होटल में काम करते हैं, जो बेटे की शहादत की खबर सुनते ही बदहवास हालत में गांव पहुंचे। रोहित का छोटा भाई मोहित अभी महज नौवीं कक्षा का छात्र है, जिसके सिर से बड़े भाई का साया हमेशा के लिए उठ गया। शुक्रवार सुबह जब रोहित की अंतिम यात्रा शुरू हुई, तो ढांढस बंधाने पहुंचे जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी और हजारों ग्रामीण फूट-फूट कर रो पड़े। पैतृक घाट बिनपुला में सेना के जवानों की मौजूदगी में पूरे विधि-विधान और सैन्य प्रोटोकॉल के साथ चिता को मुखाग्नि दी गई। अंतिम यात्रा में शामिल हर नागरिक ने नम आंखों से कसम खाई कि देश की सीमाओं की रक्षा के लिए समर्पित इस युवा सैनिक के सर्वोच्च बलिदान को उत्तराखंड और यह देश कभी नहीं भूलेगा। अपनी छोटी सी उम्र में देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले रोहित रावत हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर हो गए हैं।