सटीक आंकड़ों के अभाव में दम तोड़ रही थीं जल संरक्षण योजनाएं, अब उत्तराखंड बदलेगा अपनी तस्वीर

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हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड की सदियों पुरानी संस्कृति, पेयजल और खेती-किसानी का आधार रहे प्राकृतिक झरनों और 'गाड़-गदेरों' (छोटी पर्वतीय जल धाराएं) को लेकर एक ऐतिहासिक शुरुआत हुई है। देश के इतिहास में यह पहली बार है जब किसी राज्य में झरनों की इतनी व्यापक और व्यवस्थित वैज्ञानिक गणना की जा रही है। उत्तराखंड का लघु सिंचाई विभाग केंद्र सरकार के सहयोग से और 'हिमोत्थान' संस्था स्वतंत्र रूप से इस महा-अभियान को अंजाम दे रही है। इस गणना का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर जल स्रोतों का एक ऐसा अचूक डेटाबेस तैयार करना है, जिससे भविष्य की जल सुरक्षा और संरक्षण नीतियों को तय किया जा सके। पर्वतीय क्षेत्रों की स्थानीय भाषा में 'गाड़' उन बारहमासी छोटी नदियों को कहा जाता है जो ऊंचे पहाड़ों से तलछट और पानी लेकर बहती हैं। वहीं 'गदेरे' संकरी और मौसमी जल-धाराओं को कहा जाता है। विडंबना यह थी कि सदियों से करोड़ों लोगों की प्यास बुझाने वाले इन स्रोतों का आज तक न तो राज्य और न ही केंद्र सरकार के पास कोई प्रामाणिक रिकॉर्ड था। अनियोजित विकास, जलवायु परिवर्तन और खेती में कमी के कारण कई झरने सूख गए या लुप्त होने की कगार पर पहुंच गए। समस्या की इसी गंभीरता को देखते हुए जनवरी 2026 से राज्यभर में सघन फील्ड सर्वे शुरू किया गया, जिसकी पृष्ठभूमि 2024 से ही तैयार की जा रही थी। लघु सिंचाई विभाग द्वारा राज्य के सभी 13 जिलों में किए जा रहे डिजिटल सर्वे के शुरुआती आंकड़ों ने बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण जानकारियां सामने रखी हैं। विभाग अब तक राज्य में 42,553 झरनों का दस्तावेजीकरण कर चुका है। इसके अलावा पिथौरागढ़ में 2,821, बागेश्वर में 2,339, रुद्रप्रयाग में 2,268, देहरादून के ग्रामीण इलाकों में 1,046 और नैनीताल में 711 झरने रिकॉर्ड किए जा चुके हैं। ये आंकड़े गवाही देते हैं कि पहाड़ की 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी आज भी इन्हीं प्राकृतिक जल स्रोतों के भरोसे अपनी जिंदगी चला रही है।

सरकारी प्रयासों के समानांतर हिमालयी क्षेत्रों में काम करने वाली 'हिमोत्थान संस्था' भी भू-वैज्ञानिकों की मदद से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश (कांगड़ा, सिरमौर) और लद्दाख (लेह) में स्वतंत्र रूप से यह गणना कर रही है। संस्था के विशेषज्ञों ने वर्ष 2018 में नीति आयोग द्वारा जारी स्प्रिंग्स प्रबंधन रिपोर्ट के आंकड़ों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर देखने के बाद 2025 में यह कदम उठाया था। हिमोत्थान के भू-वैज्ञानिक निखिल के मुताबिक, संस्था के शुरुआती आकलन में केवल टिहरी, पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों में ही 36 हजार से अधिक झरने और गाड़-गदेरे होने का अनुमान है। संस्था अब तक अकेले टिहरी में 5500 और अल्मोड़ा में 6000 झरनों का वैज्ञानिक डेटा तैयार कर चुकी है। हाईटेक तकनीक से निगरानी: इस गणना को फुलप्रूफ बनाने के लिए कर्मचारी मौके पर जाकर मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए अक्षांश-देशांतर (लोकेशन) दर्ज कर रहे हैं। सभी स्रोतों की जियो-टैगिंग की जा रही है, जिससे भविष्य में उपग्रह (सैटेलाइट) के जरिए भी इनके जल प्रवाह और सूखने की स्थिति की मॉनिटरिंग की जा सकेगी। इस महा-सर्वेक्षण का एक तकनीकी पहलू यह भी है कि वर्तमान में जो आंकड़े जुटाए जा रहे हैं, वे केवल राजस्व भूमि के हैं। उत्तराखंड का एक बहुत बड़ा हिस्सा वन भूमि (Forest Land) के अंतर्गत आता है, जहां हजारों की संख्या में अज्ञात झरने और गाड़-गदेरे मौजूद हैं। वर्तमान में लघु सिंचाई विभाग या हिमोत्थान वन क्षेत्रों के भीतर गणना नहीं कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में वन विभाग को साथ लेकर वनों के भीतर बहने वाली जल धाराओं को भी इसमें जोड़ा गया, तो उत्तराखंड में प्राकृतिक जल स्रोतों की वास्तविक संख्या वर्तमान आंकड़ों से दोगुनी या उससे भी अधिक हो सकती है। लघु सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता बीके तिवारी के अनुसार, यह देश का सबसे महत्वाकांक्षी वॉटर-मैपिंग प्रोग्राम है, जिसे अगले एक महीने के भीतर पूरी तरह से समेट लिया जाएगा। इसके बाद पहली बार उत्तराखंड सरकार के पास अपने पानी का एक प्रामाणिक 'लाइफ-कार्ड' होगा। स्थानीय ग्रामीणों से बातचीत कर इन स्रोतों के पिछले 10 वर्षों के इतिहास और बदलावों को भी डेटाबेस में दर्ज किया जा रहा है। यह राष्ट्रीय डेटाबेस न केवल उत्तराखंड, बल्कि पूरे देश के लिए आने वाले समय में जल नीति, सूखा प्रबंधन और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए सबसे बड़ा हथियार साबित होने वाला है।